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पूर्व जज के. चंद्रू ने चेन्नई में कॉलेजियम पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट नियुक्तियों में “अलिखित SOP” और “भगवाकरण” का आरोप लगाया। बयान के बाद NJAC की बहस फिर तेज हुई, जिसे 2014 के बाद प्रस्तावित किया गया था और सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था।

चेन्नई में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर हुई एक चर्चा में मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस के. चंद्रू ने कॉलेजियम व्यवस्था पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उच्च न्यायालयों में “भगवाकरण” बढ़ रहा है और एक “अलिखित” मानक प्रक्रिया के तहत एक खास विचारधारा से जुड़े नाम आसानी से आगे बढ़ जाते हैं, जबकि अन्य नाम अटकते रहते हैं। यह टिप्पणी 13 अक्टूबर 2026 को सामने आई, और इसने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को लेकर पुरानी बहस को फिर से राजनीतिक और कानूनी बहस के केंद्र में ला दिया है।
चंद्रू ने यह भी कहा कि 2014 में केंद्र में सरकार बदलने के बाद राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने की पहल हुई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। उनके मुताबिक, देश में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक स्थायी और भरोसेमंद ढांचा बनाने की कोशिशें बीच में ही रुक गईं और नतीजा यह हुआ कि कॉलेजियम चलता रहा, जबकि नियुक्तियों को लेकर असंतोष और आरोप भी बने रहे।
चेन्नई के एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म में ‘हू विल जज द जजेज’ विषय पर हुई संगोष्ठी में चंद्रू ने मुख्य भाषण दिया, जिसका शीर्षक था: “जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था एक संवैधानिक तख्तापलट है।” भाषण में उन्होंने कहा कि एक ऐसी लिखित, सार्वजनिक और जवाबदेह व्यवस्था नहीं बनाई गई जो नियुक्तियों और स्थानांतरण के फैसलों को स्पष्ट मानकों पर टिकाए।
उनका आरोप था कि अब एक अनौपचारिक ‘एसओपी’ जैसा ढांचा बन गया है। चंद्रू ने कहा, “भगवाकरण बढ़ रहा है. हर हाईकोर्ट में उस भगवा समूह से जुड़ा एक व्यक्ति मौजूद है… अगर आप भगवा समूह से जुड़े हैं, तो आपकी सूची आगे बढ़ जाएगी, अन्यथा आपकी सूची रोक दी जाएगी और लगातार अटकी रहेगी.”
चंद्रू का यह बयान ऐसे समय आया है जब कॉलेजियम प्रणाली पर पारदर्शिता, देरी और चयन के मानकों को लेकर सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं। उनकी बातों ने बहस को एक बार फिर इस बिंदु पर ला खड़ा किया है कि नियुक्तियों में ‘कौन’ और ‘कैसे’ तय करता है, और क्या मौजूदा ढांचे में भरोसे की कमी बढ़ रही है।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) एक प्रस्तावित निकाय था, जिसे कॉलेजियम प्रणाली के विकल्प के तौर पर देखा गया था। इसके बारे में उपलब्ध पृष्ठभूमि के मुताबिक, यह आयोग भारत में उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए कॉलेजियम को बदलने हेतु प्रस्तावित था।
साथ ही, संरचित जानकारी के अनुसार NJAC को एक ऐसे प्रस्तावित निकाय के रूप में देखा गया था जो भारत सरकार और सभी राज्य सरकारों के तहत न्यायिक अधिकारियों, विधिक अधिकारियों और विधिक कर्मचारियों की भर्ती, नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए जिम्मेदार होता। यानी इसके दायरे और भूमिका की परिकल्पना केवल शीर्ष अदालतों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक प्रशासनिक-कानूनी ढांचे तक फैली हुई बताई जाती है।
चंद्रू ने अपने भाषण में कहा कि 2014 के बाद केंद्र सरकार ने NJAC बनाने की पहल की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि फैसले के बाद कानून में संशोधन कर एक स्थायी नियुक्ति ढांचा खड़ा करने की दिशा में ठोस कदम नहीं बढ़े, और कॉलेजियम ही जारी रहा।
यहां यह फर्क भी उभरता है कि NJAC का विचार नियुक्तियों के लिए संस्थागत ढांचा बनाने का था, जबकि कॉलेजियम प्रणाली न्यायपालिका के भीतर विकसित एक व्यवस्था के तौर पर चलती रही है। चंद्रू के आरोपों के केंद्र में यही सवाल है कि जब प्रक्रिया लिखित और सार्वजनिक मानकों से बंधी नहीं होगी, तो चयन और मंजूरी के फैसले संदेह के घेरे में आएंगे।
चंद्रू की टिप्पणी ने NJAC पर बहस को ‘सिस्टम बनाम सिस्टम’ की पुरानी बहस से आगे, नियुक्ति प्रक्रिया में कथित झुकाव और मंजूरी के तरीकों पर ला दिया है। उनका दावा है कि एक खास विचारधारा से जुड़े नामों को मंजूरी मिलने में आसानी होती है और बाकी नामों की सूची अटकती रहती है।
उनकी बातों का एक सीधा असर यह है कि कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर पारदर्शिता की मांग तेज होने की संभावना बढ़ जाती है, खासकर तब जब सार्वजनिक मंचों पर पूर्व न्यायाधीश यह कहें कि एक ‘अलिखित’ प्रक्रिया काम कर रही है। दूसरी ओर, NJAC जैसे वैकल्पिक ढांचे का विचार भी फिर से बहस में आएगा, क्योंकि चंद्रू ने इसे रद्द किए जाने का जिक्र करते हुए स्थायी व्यवस्था न बनने की आलोचना की है।
फिलहाल, उपलब्ध सामग्री में किसी नए विधायी कदम, अदालत में नई याचिका, या सरकार की ताजा पहल का विवरण नहीं है। लेकिन चेन्नई की इस संगोष्ठी से उठी बातों ने यह साफ कर दिया है कि न्यायिक नियुक्तियों पर भरोसे, जवाबदेही और प्रक्रिया की स्पष्टता को लेकर बहस थमी नहीं है, और NJAC का नाम एक बार फिर उसी बहस के केंद्र में लौट आया है।
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